Saturday, October 4, 2014

कुछ न कुछ जरूर कहता है आपके शरीर पर तिल ############### लगभग हर पुरूष व स्त्री के किसी न किसी अंग पर तिल अवश्य पाया जाता है। उस तिल का महत्व क्या है? शरीर के किस हिस्से पर तिल का क्या फल मिलता है। ज्‍योतिष के अभिन्‍न अंग सामुद्रिकशास्‍त्र के अनुसार शरीर के किसी भी अंग पर तिल होना एक अलग संकेत देता है। यदि तिल चेहरे पर कहीं भी हो, तो आप व्‍यक्ति के स्‍वभाव को भी समझ सकते हैं। खास बात यह है कि पुरुष के दाहिने एंव सत्री के बायें अंग पर तिल के फल को शुभ माना जाता है। वहीं अगर बायें अंगों पर हो तो मिले जुले परिणाम मिलते हैं। 1. माथे पर दायीं ओर माथे के दायें हिस्से पर तिल हो तो- धन हमेशा बना रहता है। 2. माथे पर बायीं ओर माथे के बायें हिस्से पर तिल हो तो- जीवन भर कोई न कोई परेशानी बनी रहती है। 3. ललाट पर तिल ललाट पर तिल होने से- धन सम्पदा व ऐश्वर्य का भोग करता है। 4. ठुड्डी पर तिल ठुड्डी पर तिल होने से- जीवन साथी से मतभेद रहता है। 5. दायीं आंख के ऊपर दांयी आंख के ऊपर तिल हो तो- जीवन साथी से हमेशा और बहुत ज्‍यादा प्रेम मिलता है। 6. बायीं आंख के ऊपर बायीं आंख पर तिल हो तो- जीवन में संघर्ष व चिन्ता बनी रहेगी। 7. दाहिने गाल पर दाहिने गाल पर तिल हो तो- धन से परिपूर्ण रहेगें। 8. बायें गाल पर बायें गाल पर तिल हो तो- धन की कमी के कारण परेशान रहेंगे। 9. होंठ पर तिल होंठ पर तिल होने से- काम चेतना की अधिकता रहेगी। 10. होंठ के चीने होंठ के नीचे तिल हो तो- धन की कमी रहेगी। 11. माथे पर दायीं ओर माथे के दायें हिस्से पर तिल हो तो- धन हमेशा बना रहता है। 12. बायें कान पर बायें कान पर तिल हो तो- दुर्घटना से हमेशा बच कर रहना चाहिये। 13. दाहिने कान पर दाहिने कान पर तिल होने से- अल्पायु योग किन्तु उपाय से लाभ होगा। 14. गर्दन पर तिल गर्दन पर पर तिल हो तो- जीवन आराम से व्यतीत होगा, यक्ति दीर्घायु, सुविधा सम्पन्न तथा अधिकारयुक्त होता है। 15. दाहिनी भुजा पर दायीं भुजा पर पर तिल हो तो- साहस एंव सम्मान प्राप्त होगा। 16. बायीं भुजा बायीं भुजा पर तिल होने से- पुत्र सन्तान होने की संभावना होती है और पुत्र से सुख की प्राप्ति होती है। 17. छाती पर दाहिनी ओर छाती पर दाहिनी ओर तिल होने से- जीवन साथी से प्रेम रहेगा। 18. छाती पर बायीं ओर छाती पर बायीं ओर तिल होने से- जीवन में भय अधिक रहेगा। 19. नाक पर तिल नाक पर तिल हो तो- आप जीवन भर यात्रा करते रहेंगे। 20. दा‍यीं हथेली पर दायीं हथेली पर तिल हो तो- धन लाभ अधिक होगा। 21. बायीं हथेली पर बायीं हथेली पर पर तिल हो तो- धन की हानि होगी। 22. पैर पर तिल पांव पर तिल होने से- यात्रायें अधिक करता है। 23. भौहों के मध्‍य भौहों के मध्य तिल हो तो- विदेश यात्रा से लाभ मिलता है। 24. जांघ पर तिल जांघ पर तिल होने से- ऐश्वर्यशली होने के साथ अपने धन का व्यय भोग-विलास में करता है। उसके पास नौकरों की कमी नहीं रहती है। 24. स्‍त्री की भौहों पर स्त्री के भौंहो के मध्य तिल हो तो- उस स्त्री का विवाह उच्चाधिकारी से होता है। 26. कमर पर कमर पर तिल होने से- भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है। 27. पीठ पर तिल पीठ पर तिल हो तो- जीवन दूसरे के सहयोग से चलता है एंव पीठ पीछे बुराई होगी। 28. नाभि पर तिल नाभि पर तिल होने से- कामुक प्रकृति एंव सन्तान का सुख मिलता है। 29. बायें कंधे पर बायें कंधे पर तिल हो तो- मन में संकोच व भय रहेगा। 30. दायें कंधे पर दायें कंधें पर तिल हो तो- साहस व कार्य क्षमता अधिक होती है. @@@ पं सुशील मिश्रा ...!! जय श्री राम. ....!!

Monday, September 29, 2014

महाजनस्य संसर्गः, कस्य नोन्नतिकारकः। पद्मपत्रस्थितं तोयम्, धत्ते मुक्ताफलश्रियम् ॥ ........ हिंदी अनुवाद महापुरुषों का सामीप्य किसके लिए लाभदायक नहीं होता, कमल के पत्ते पर पड़ी हुई पानी की बूँद भी मोती जैसी शोभा प्राप्त कर लेती है|

कुसुमस्तबकस्येव द्वयीवृत्तिर्मनस्विनः। मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य विशीर्येत वनेऽथवा ।। ...... फूलों की तरह मनस्वियों की दो ही गतियाँ होती हैं; वे या तो समस्त विश्व के सिर पर शोभित होते हैं या वन में अकेले मुरझा जाते हैं॥

मन्दोऽप्यमन्दतामेति संसर्गेण विपश्चितः। पङ्कच्छिदः फलस्येव निकषेणाविलं पयः॥ ....... बुद्धिमानों के साथ से मंद व्यक्ति भी बुद्धि प्राप्त कर लेते हैं जैसे रीठे के फल से उपचारित गन्दा पानी भी स्वच्छ हो जाता है॥

केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः न स्नानं न विलोपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः। वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता र्धायते क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥ ....... बाजुबंद पुरुष को शोभित नहीं करते और न ही चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार, न स्नान, न चन्दन, न फूल और न सजे हुए केश ही शोभा बढ़ाते हैं। केवल सुसंस्कृत प्रकार से धारण की हुई एक वाणी ही उसकी सुन्दर प्रकार से शोभा बढ़ाती है। साधारण आभूषण नष्ट हो जाते हैं, वाणी ही सनातन आभूषण है॥

क्रोधो मूलमनर्थानां क्रोधः संसारबन्धनम्। धर्मक्षयकरः क्रोधः तस्मात् क्रोधं विवर्जयेत्॥ ..... क्रोध समस्त विपत्तियों का मूल कारण है, क्रोध संसार बंधन का कारण है, क्रोध धर्म का नाश करने वाला है, इसलिए क्रोध को त्याग दें।