us pathik ki path pahchan hai kaya.
Jis raah me bikhre shool na ho.
Navik ki dhairy pariccha kaya.
Jab dhaarayen vipret na hon.
Thursday, March 14, 2013
***Saccha pathik***
Friday, May 18, 2012
वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है |.समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही है |सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है| वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है| वेदों की ऋचाओं में अनेक स्थानों पर सूर्य देव की स्तुति की गई है | पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति ,प्रभाव ,स्तुति मन्त्र इत्यादि का वर्णन है | ज्योतिष शास्त्र में नव ग्रहों में सूर्य को राजा का पद प्राप्त है | प्रस्तुत लेख में सूर्य का पुराणों एवम ज्योतिष साहित्य के आधार पर तुलनात्मक अध्ययन किया गया है |
सूर्य देव की उत्पत्ति
मार्कंडेय पुराण के अनुसार पहले यह सम्पूर्ण जगत प्रकाश रहित था | उस समय कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रगट हुए | उनके मुख से प्रथम शब्द ॐ निकला जो सूर्य का तेज रुपी सूक्ष्म रूप था | तत्पश्चात ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रगट हुए जो ॐ के तेज में एकाकार हो गये |
यह वैदिक तेज ही आदित्य है जो विश्व का अविनाशी कारण है| ये वेद स्वरूप सूर्य ही श्रृष्टि की उत्पत्ति ,पालन व संहार के कारण हैं | ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को ही धारण किया |
श्री राम स्तुति
श्री राम चन्द्र कृपालु भजमन हरण भव भय
दारूणम।
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारूणमऽऽ
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारूणमऽऽ
कंदर्प अगणित अमित छवि नवनील नीरद
सुंदरम।
पटपीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमि जनकसुतावरमऽऽ
पटपीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमि जनकसुतावरमऽऽ
भज दीनबन्धु दिनेश दानव
दैत्यवंशनिकंदनम।
रघुनंद आनंदकंद कौशलचंद दशरथनंदनमऽऽ
रघुनंद आनंदकंद कौशलचंद दशरथनंदनमऽऽ
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारू उदारू
अंगविभूषणम।
आजानुभुज शरचाप धर संग्रामजित खरदूषणमऽऽ
आजानुभुज शरचाप धर संग्रामजित खरदूषणमऽऽ
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन
रंजनम।
मम हृदयकुंज निवास कुरू कामादि खलदल गंजनमऽऽ
मम हृदयकुंज निवास कुरू कामादि खलदल गंजनमऽऽ
Saturday, March 24, 2012
भक्तों का कल्याण करने के लिये माता नौ रुपों में प्रकट हुई. इन नौ रुपों में से नवम रुप माता सिद्धिदात्री का है. यह देवी अपने भक्तोम को सारे जगत की रिद्धि सिद्धि प्रदान करती है. माता के इन नौ रुपों की न केवल मनुष्य बल्कि देवता, ऋषि, मुनि, सुर, असुर, नाग सभी उनके आराधक है. माता सिद्धिदात्री अपने भक्तों के रोग, संताप व ग्रह बधाओं को दुर करने वाली कही गई है.
इस प्रकार नवरात्रों के नौ दिनों में माता के अलग अलग रुपों की पूजा की जाती है.
माता का आंठवा रुप माता महागौरी का है. एक पौराणिक कथा के अनुसार शुभ निशुम्भ से पराजित होने के बाद गंगा के तट पर देवता माता महागौरी की पूजा कर रहे थे, और राक्षसों से रक्षा करने की प्रार्थना कर रहे थे, इसके बाद ही माता का यह रुप प्रकट हुआ और देवताओं की रक्षा हुई. इस माता के विषय में यह मान्यता है कि जो स्त्री माता के इस रुप की पूजा करती है, उस स्त्री का सुहाग सदैव बना रहता है. कुंवारी कन्या पूजा करें, तो उसे योग्य वर की प्राप्ति होती है. साथ ही जो पुरुष माता के इस रुप की पूजा करता है, उसका जीवन सुखमय रहता है. माता महागौरी अपने भक्तों को अक्षय आनन्द ओर तेज प्रदान करती है.
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