*सुमंगलम् भवतु*"
नूतन् दिवसस्य अतीव् शुभकामनाः"
नित्य प्रभात् प्रार्थना "
ब्रह्मा मुरारीस्त्रिपुरांतकारी
भानुः शशि भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवेः
कुर्वन्तु सर्वे मम सु प्रभातम्"
ब्रह्मा, मुरारि (विष्णु) और त्रिपुर-नाशक शिव (अर्थात तीनों देवता) तथा सूर्य, चन्द्रमा, भूमिपुत्र (मंगल), बुध, बृहस्पति, शुक्र्र, शनि, राहु और केतु ये नवग्रह, सभी मेरे प्रभात को शुभ एवं मंगलमय करें"!!
ऊँ सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः"
सर्वेभ्यो देविभ्यो नमः"
नवग्रह देवताभ्यो नमः"
कुल देवताभ्यो नमः"
ग्राम देवताभ्यो नमः"
स्थान देवताभ्यो नमः"
वास्तु देवताभ्यो नमः"
इष्ट देवताभ्यो नमः"
मातृ-पितृ चरण कमलेभ्यो नमः"!!
हरिः ऊँ शान्तिः"शान्तिः"सुशांतिर्भवतु"
सुशील मिश्रः"
शुभदिनमस्तु
Saturday, August 27, 2016
@***सुप्रभातम्***@
Tuesday, August 23, 2016
@श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्वणः शुभेच्छाः@
*सुमंगलम् भवतु*"
*श्री कृष्ण शरणं ममः*"
*जन्माष्टमी पर्वणः शुभेच्छाः*"
☼ ☼@ ☼ ☼
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*श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्वस्य सर्वेषां हार्दिक शुभेच्छाः*"
*अद्य जन्माष्टमी पर्वः अस्ति*।
*श्री कृष्णः भारतीयसम्प्रदाये सनातन धर्मे परमतत्वं श्री कृष्णस्तु स्वयं भगवान इति कथ्यते*"!
*श्री कृष्णः अति श्रृंगारप्रिय देवः प्रसिद्धः*"
*मृत्युलोके इह श्री कृष्णः द्वापरयुगे मथुरानगरस्य कारागृहे अर्धरात्र्याम् ऽवतृतः*"! *तस्य जननी देवकी जनक वसुदेवश्च*"!!
*अस्मिन् दिवसे सर्वान् कृष्णभक्तान् सर्वाभीष्ट सिद्धये*
*श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रतं कुर्वन्ति*!!
*कृष्णाय वासुदेवाय, देवकी-नन्दनाय च*,!
*नंद-गोप-कुमाराय, गोविन्दाय नमो नमः*"!!
!! *जयतु"जयतु, श्री कृष्णः*"!!
*धन्यवादः*"!
*ॐ सर्वेषां स्वस्तिर्भवतु । सर्वेषां शान्तिर्भवतु । सर्वेषां पूर्णं भवतु । सर्वेषां मङ्गलं भवतु*" !!
*विजयी भव सर्वत्र* !
*सर्वदा, जयतु* !!
*ऊँ नमो वासुदेवाय*"
*शुभदिनमस्तु*"
*सुशील मिश्रः*"
Monday, August 22, 2016
ऊँ श्री मन्महागणाधिपतये नमः"
*सुमंगलम् भवतु"*
*ऊँ श्री मन्महागणाधिपतये नमः*"!!
*संकष्टी चतुर्थी पर्वणः भवतां सर्वेषां हार्दिक् शुभकामनाः"*
*भगवतः कृपा सर्वेषां उपरि भवतु*"
*सर्व मनोकामनाः सफली भवन्तु*"
*सर्वेषां स्वस्तिर्भवतु" सर्वेषां शान्तिर्भवतु" सर्वेषां पूर्णं भवतु" सर्वेषां मङ्गलं भवतु*"!!
*विजयी भव सर्वत्र* !
*सर्वदा, जयतु* !!
*इति भगवत्चरणयोः सर्वदा प्रार्थयामहे*"
*गजाननाय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात*""!!
*जयतु जयतु जय जयतु गणेशः*"!
*शुभमस्तु*"
*सुशील मिश्रः*"
Friday, August 19, 2016
"संस्कृत दिवसः"
सुमंगलम् भवतु"
भवतां सर्वेषां"
संस्कृत"दिवसस्य"श्रावणीपर्वस्य"
रक्षाबन्धनस्य च शुभाशयाः"!!
विश्वस्य सर्व भाषासु प्राचीनतमेयं संस्कृतम्" इयं सर्वासां भाषाणमुत्पादयित्री जननीव"
संस्कृत भारतस्य गौरवम् उद्घोषयति" !
श्रावण मासे पूर्णिमा तिथौ 1969 तमें वर्षे संस्कृत दिवसस्य शुभारंभं"अभवत्"
कृपया सर्वेषां संस्कृतस्य प्रचार प्रसाराय सहयोगं कुरु"
यत्र, तत्र, सर्वत्र भवतु संस्कृतम्" जयतु संस्कृतम्-जयतु संस्कृतम्-जयतु संस्कृतम्"!!
इति भगवत्चरणयोः सर्वदा प्रार्थयामहे"
एकदा पुनः सर्वेषां अतीव शुभकामनाः""
नमों वासुदेवाय"
नमों राघवाय"
शुभदिनमस्तु"
*"सुशील मिश्रः*"
" स्वतंत्रता दिवसः"
*सुमंगलम् भवतु*"
*स्वतंत्रता दिवसस्य सर्वेषां अनन्तानन्त'शुभकामनाः*
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*अद्य अस्माकं स्वतंत्रता दिवसः अस्ति*"!
*इयम् पर्वः भारतदेशस्य गौरवस्य प्रतीकः अस्ति*"।
*अत: एष: दिवस: अस्माकं कृते सर्वदा महान दिवसः भवति*"!!
*आगम्यतां अस्माकं शहीदजनानां स्मरणं कुर्म:*" ।
*जयतु भारतम्, वंदेमातरम*!
*गायन्ति देवाः किल गीतकानि , धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे* ।"
*स्वर्गापवर्गास्पद् मार्गभूते , भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वाद्* ॥"
*देवतागण गीत गाते हैं कि स्वर्ग और मोक्ष को प्रदान करने वाले मार्ग पर स्थित भारत के लोग धन्य हैं* । *क्योंकि*" *देवता भी जब पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं तो यहीं जन्मते हैं* ।"
*जयतु भारतम्, वंदेमातरम*!
*धन्यवादः*!!"
☼ ☼ ☼ ☼ ☼ ☼
*ॐ सर्वेषां स्वस्तिर्भवतु । सर्वेषां शान्तिर्भवतु । सर्वेषां पूर्णं भवतु । सर्वेषां मङ्गलं भवतु* "।
*ऊँ नमः शिवाय*"
*ऊँ नमो राघवाय*"
*विजयी भव सर्वत्र*!,
*सर्वदा जयतु* !!"
*शुभदिनमस्तु* !
" *सुशील मिश्रः*"
Wednesday, March 16, 2016
#सुमंगलम्"
#सुमंगल भवतु"
"गीता के कुछ श्लोक और उनके अर्थ"
!! श्री कृष्ण शरणम् ममः !!
@
मित्रों, आइए आज गीता के कुछ श्लोकों को अर्थ सहित पढ़ें। इनमें भगवान ने स्वयं अपने बारे में कुछ संकेत दिए हैं। गीता इस पृथ्वी के महानतम ग्रंथों में से एक है।
इसे पढ़ना स्वयं को शुद्ध करना है"!
@"जय श्री कृष्ण"@
"अथ ध्यानम्"
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शान्ताकारं भुजगशयनं पद्यनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।
भावार्थ : जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
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कृष्ण भगवान ही नहीं महायोगी भी थे।
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यदा-यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥'हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूं अर्थात् साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूं। सज्जन पुरुषों के रक्षार्थ पाप कर्म करने वालों का खात्मा करने के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में यानी हर समय प्रकट होता हूं।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥-अर्थात् जो बिना इच्छा के अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है, जो सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों से सर्वथा परे हो गया है जो कर्म करते हुए भी उससे बंधता नहीं है- ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहनेवाला ही सच्चा कर्मयोगी कहलाता है।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ८ ॥
सरल (साधु) पुरुषोंके उद्धारार्थ, दुष्कर्मीयोंके विनाशार्थ और सच्चे धर्मकी पुनःस्थापना करनेके लिए मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ ।
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥
भावार्थ : मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ॥
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥
भावार्थ : हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात निर्मल और अलौकिक हैं- इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से (सर्वशक्तिमान, सच्चिदानन्दन परमात्मा अज, अविनाशी और सर्वभूतों के परम गति तथा परम आश्रय हैं, वे केवल धर्म को स्थापन करने और संसार का उद्धार करने के लिए ही अपनी योगमाया से सगुणरूप होकर प्रकट होते हैं। इसलिए परमेश्वर के समान सुहृद्, प्रेमी और पतितपावन दूसरा कोई नहीं है, ऐसा समझकर जो पुरुष परमेश्वर का अनन्य प्रेम से निरन्तर चिन्तन करता हुआ आसक्तिरहित संसार में बर्तता है, वही उनको तत्व से जानता है।) जान लेता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है॥
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥
भावार्थ : इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन किया करते हैं क्योंकि उनको कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम् ॥
भावार्थ : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उस सृष्टि-रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू वास्तव में अकर्ता ही जान॥
कर्मण्य कर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥
भावार्थ : जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है॥
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पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥
भावार्थ : इस संपूर्ण जगत् का धाता अर्थात् धारण करने वाला एवं कर्मों के फल को देने वाला, पिता, माता, पितामह, जानने योग्य, पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ॥
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥
भावार्थ : प्राप्त होने योग्य परम धाम, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ॥
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥
भावार्थ : मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत्-असत् भी मैं ही हूँ॥
@जय श्री कृष्ण@
धन्यवादः !
ॐ सर्वेषां स्वस्तिर्भवतु । सर्वेषां शान्तिर्भवतु । सर्वेषां पूर्णं भवतु । सर्वेषां मङ्गलं भवतु !!
_/\_ II जय श्री राम !!
#शुभदिनमस्तु !!
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Thursday, December 17, 2015
(.Vidhya vinayen shobhate.): संसार रूपी विष - वृक्ष के दो फल अमृततुल्य हैं - का...
#___शुभ्_ _रात्री___# #
वन्देमातरम,,,जय श्री राम !!